अनेकता में एकता का दिव्य स्वरूप – निरंकारी संत समागम

मानवीय गुणों से युक्त होना ही मानव होने का प्रमाण — निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज


सांगली, 26 जनवरी 2026 : “मनुष्य का शरीर धारण करना ही यथार्थ मानव होने का प्रमाण नहीं है, अपितु मानवीय गुणों से युक्त होना ही मानव होने का वास्तविक प्रमाण है।” ये प्रेरणादायी उद्गार निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने महाराष्ट्र के 59वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के दूसरे दिन विशाल मानव परिवार को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

यह तीन दिवसीय संत समागम सांगली–ईश्वरपुर रोड स्थित सांगलवाड़ी के विशाल मैदान में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भक्त एवं प्रभुप्रेमी सज्जन सतगुरु के दिव्य दर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु पधारे हैं। समाज के हर वर्ग से आए श्रद्धालु सभी भेदभावों को मिटाकर आत्मभाव से युक्त होकर जिस प्रकार आपस में प्रेमपूर्वक रह रहे हैं, वह वास्तव में अनेकता में एकता तथा वसुधैव कुटुम्बकम् का दिव्य दृश्य प्रस्तुत कर रहा है।

सतगुरु माता जी ने मनुष्य जीवन के महत्व को समझाते हुए फरमाया कि मनुष्य को यह दुर्लभ मानव तन प्राप्त हुआ है, तो इसका मुख्य उद्देश्य गफलत की नींद से जागकर परमात्मा की प्राप्ति करना है। परमात्मा के दर्शन कर उसे अपने जीवन में पूर्ण रूप से उतार लेने पर, व्यक्ति को अपने भीतर-बाहर तथा सृष्टि के कण-कण में परमात्मा का अनुभव होने लगता है। इससे जाति, वर्ण, प्रांत, भाषा, खान-पान आदि के सभी भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं और प्रत्येक मनुष्य में परमात्मा का रूप देखकर उसका आदर-सम्मान करना संभव हो पाता है।

सतगुरु माता जी ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मनुष्य में यह क्षमता निहित है कि वह दिव्य गुणों से संपन्न होकर एक श्रेष्ठ इंसान बने या इसके विपरीत अहंकार से भरा जीवन जिए। हमें किस प्रकार का जीवन जीना है, इसका विवेकपूर्ण चयन करने की समझ परमात्मा ने प्रत्येक मानव को प्रदान की है।

इससे पूर्व निरंकारी राजपिता जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मनुष्य अपने संस्कारों के अनुसार ईश्वर की आराधना करता है, पठन-पाठन भी करता है, परंतु जब यह प्रश्न उठता है कि जिसकी हम पूजा करते हैं, वह दिखाई क्यों नहीं दे या मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, अथवा मैं कौन हूँ—तो इन प्रश्नों के उत्तर उसे नहीं मिल पाते। वास्तव में इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमें परमात्मा के एहसास से प्राप्त होते है। जब परमात्मा का बोध हो जाता है, तब वही परमात्मा सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगता है। जो व्यक्ति अपनी ‘मैं’ को त्यागकर सतगुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण कर देता है, उसे क्षणमात्र में सतगुरु की कृपा से परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं।

निरंकारी प्रदर्शनी
समागम स्थल पर लगाई गई भव्य ‘निरंकारी प्रदर्शनी’ श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। इस वर्ष प्रदर्शनी ‘आत्ममंथन’ विषय पर आधारित है, जिसमें आत्मचिंतन, आत्मबोध तथा मानवीय मूल्यों के महत्व को अत्यंत प्रेरणादायी और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

यह प्रदर्शनी मुख्य रूप से तीन खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड में मिशन का इतिहास, उसकी विचारधारा तथा देश-विदेश में किए जा रहे मानवता से जुड़े सेवा कार्यों की झलकियाँ प्रदर्शित की गई हैं। दूसरा खंड ‘बाल प्रदर्शनी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें बच्चों को उज्ज्वल एवं संस्कारित जीवन जीने की प्रेरणा देने वाले शिक्षाप्रद और रोचक मॉडल प्रदर्शित किए गए हैं, जिसका उल्लेख निरंकारी राजपिता जी ने अपने विचारों में भी किया। तीसरे खंड में मिशन की समाज-कल्याण शाखा ‘संत निरंकारी चैरिटेबल फाउंडेशन’ द्वारा संचालित विभिन्न सामाजिक गतिविधियों का विस्तृत प्रदर्शन किया गया है।

इस प्रदर्शनी का उद्घाटन समागम से पूर्व निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता जी के पावन सान्निध्य में किया गया था। तब से निरंतर श्रद्धालु बड़ी संख्या में इस प्रदर्शनी को देखने के लिए आ रहे हैं। अब तक प्रदर्शनी के तीनों खंडों को मिलाकर लगभग पाँच लाख श्रद्धालु इसका अवलोकन कर चुके हैं और आत्मिक आनंद की अनुभूति प्राप्त कर चुके हैं।


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